मैं आज आपको एक कहानी सुनाने जा रहा हूँ,
एक तस्वीर है जो मन के कोने में उभरती है, जैसे सुबह की पहली किरण धुंध को चीर कर निकालती है। एक स्पर्श का एहसास है, नरम और गुनगुना, जो अब तक मेरी त्वाचा के हर रोम को जगाता है।
उनके हाथों की रेखाओं में मेरे होने की कहानी थी, जैसे हर रेखा मेरे वजूद को थामे हुए किसी अदृश्य धागे से बंधी हो। लगता था, वो रेखाएँ मेरी आत्मा की गुप्त गाथा सुनाती हों, जो मैं खुद भी कभी पूरी तरह नहीं समझ पाया। उनके दुपट्टे के कोने से उठती एक अनजानी खुशबू थी—गीली मिट्टी जैसी, लेकिन उसमें समय का कोई पुराना राज बसा था, या शायद एक नई ज़िंदगी का संकेत। उस खुशबू में ऐसी शक्ति थी, जो दुनिया के हर दर्द को एक पल में किसी धुंधले सपने में बदल सकती थी।
मुझे याद है, उनका एक थका हुआ चेहरा, पर उस थकान के पीछे एक अजीब सी उजास थी। उनकी आँखों में एक नई दुनिया थी, जो शायद मेरी मुस्कान के साथ बूनी जा रही थी। मेरे नन्हे हाथ उनकी उंगली के एक कोने को थाम कर अपने होने का एहसास दिलाने की कोशिश करते थे।
कुछ अलग से शब्द थे, उन शब्दों में संसार का हर राग छुपा हुआ था, और वो राग मेरा था.
ये मेरी माँ है, ये मेरे स्मृतिपटल पे मेरी माँ की पहली छवि है, पहली स्मृति है। और ये; एक कहानी है, और ये कहानी एक झूठ है, या दूसरे तरीके से बोला जाए तो शायद बस एक कल्पना। लेकिन आप सबने इसे अपनी भावनाओं के दर्पण में जरूर देखा होगा, अपने अलग-अलग रंगों में।
यथार्थ ये है कि अपने जीवन में, आज तक, ऐसी किसी भी स्मृति का साक्षातकार नहीं कर पाया हूँ। पर शायद, कहानियों का असली मकसद भी यही है—हमें उन जज्बातों और कल्पनाओं से जोड़ना, जो हमारे अपने ना हो कर भी हमारे होते हैं।
एक धुन्धला सा संबंध, जो असलियत और कल्पना के बीच संवेदना का एक पुल बनता है।
हमारे आस-पास जो कुछ भी दिखता है - वास्तव में हो या कल्पना, सब कुछ सिर्फ नज़र का भेद है। कभी-कभी ये लगता है जैसे कोई अदृश्य तिलिस्म अपने आप को गढ़ रहा हो, और हर पल एक कहानी के रूप में सजीव होता जा रहा हो।
जैसा की गीतांजलि श्री अपनी किताब, "रेत समाधि" में कहती हैं, एक कहानी अपने आप को कहती है। मुकम्मल कहानी होगी, और अधूरी भी जैसी कहानियों का चलन रहा है।
एक कहानी न तो लेखक को कहती है, न ही पाठक को। एक कहानी कहती है अपने आप को, समझने वाले आप होते हैं। आपने जो समझा, कहानी ने भी बस वही कहा। दूसरे दिन से बोला जाए, तो एक कहानी आपके मन का दर्शन है।
एक कहानी किस तरह बनती है, और वह कब किस मोड़ पर पहुंचेगी, यह लेखक को भी नहीं पता होता। एक हवा चलती है, जिसमें कहानी उड़ती है, जो घास उगती है, हवा की दिशा में देह को उत्तेजित करती है, और डूबता सूरज भी कहानी के ढेरों कंदील जलाकर बादलों पर लटकता है। राह आगे यूं बढ़ती है, दाएं होती, बाएं होती, घुमावदार बनती, जैसे होश नहीं कि कहां जाए।
वो राह अपने आप बनाती है—कभी सीधी, कभी तिरछी, कभी उलझी हुई, और कभी मोड़ से भरी। कहानियों का यह सफर अक्सर होश से परे होता है, एक अज्ञानी लहर के साथ बहते जाना, बिना इस बात की चिंता की यह कहां ले जाएगी।
मिसाल के तौर पर, एक कहानी है—"कफ़न", जो मुंशी प्रेमचंद की कल्पना का एक गहरा और संवेदनशील रूप है। इस कहानी का सार यह है कि जब माधव की पत्नी की मौत हो जाती है, तो उसके बाद जो धन उन्हें कफ़न के लिए मिलता है, उसे वह अपनी भूख और प्यास को शांत करने में, यानी कि शराब और खाना खाने में खर्च कर देते हैं।
कहानी ने अपनी बात तो कह दी, समझना आपका काम है।
समझने की एक और दिशा हो सकती है—कि कैसे कुछ लोग धन और दौलत के जाल में इतने अंधे हो जाते हैं, कि वे अपने कर्मों की संवेदना और मानवता को ही भूल जाते हैं। मगर यह भी सच है कि हर नजरिया अपनी जगह पर सही है—जो व्यक्ति नीति हीन है, उसे नैतिकता सिखाने से क्या फायदा? भेद सिर्फ आपकी नजर और नजरिए का है—वो नजरिया जो आपने अपने अनुभवों से, समाज से, और अपनी परिस्थितियों से अपनाया है।
मेरी कहानी समाप्त हुई। यह कहानी, एक कहानी के ऊपर थी, या नजरिए के ऊपर—खैर, इसका फैसला आपकी नजरिए पर छोड़ देना बेहतर होगा।
यह कहानी कईयों को समझ में आई होगी, और कईयों को शायद नहीं। जिन्हें समझ आई, उनके लिए तालियाँ—और जो नहीं समझ पाए, उन्हें या तो अपने आप को 'गधा' मान लेना चाहिए, या फिर लेखक को ही 'गधा' समझ लेना चाहिए। क्योंकि कहानी अपने आप को कहती है, समझना आपका काम है, भेद बस आपकी नजरिए में है। या तो आप गधे हैं, या तो मैं—भेद आपकी नजर का है...
— अपूर्व