न जय की चाह, न पराजय का शोक,
बस धैर्य का दीपक ले चलता हूँ।
हर बाधा को मैं हँस के पी जाऊँ,
पर पेट की पीड़ा से मुँह फेरता हूँ।
हाँ, मैं टट्टी रोक के बैठा हूँ,
मैं टट्टी रोक के बैठा हूँ।

ना जीत में कुछ छिना मुझे,
ना हार में कुछ खोना था।
संग्राम पथ जो मिला मुझे,
वो भी सही — जो रोना था।
हर भाव जलाया सीने में,
पर मल त्याग नहीं होने दिया,
मैं वीरव्रती सा बैठा रहा,
निष्क्रिय नहीं, संयम में जिया।
हाँ, मैं टट्टी रोक के बैठा था।

जब पेट की लहरें उठती थीं,
ज्वार-भाटे-से टूटती थीं,
मैं मर्म-मंथन करता था,
पर आत्मबल से छूटती थीं।
ना करुणा मांगी, ना क्रंदन किया,
मैं लज्जा की मशाल लिए
मौन साधक-सा बैठा रहा...
हाँ, मैं टट्टी रोक के बैठा था।

ना युद्ध था ये रणभूमि का,
ना तीर चले, ना खड्ग गिरे।
पर एक आंतरिक तूफान में,
एक चट्टान-सा अडिग जिए।
मुझे ना सिंहासन चाहिए,
ना शौर्य की कोई माला,
बस बिस्तर बचा रहे मेरा,

जब मन डगमगाया, देह काँपी,
और गर्जन हुआ अंतर्मन में,
जब शत्रु ने छेड़ा अंतिम वार,
और युद्ध हुआ बिस्तर में,

तब अंत में...
जहाँ स्वप्न भी स्थिर न रह सके,
जहाँ संयम का दुर्ग गिरा,
मैंने टट्टी... बिस्तर पर ही कर दिया।

सच्ची घटनाओं पर आधारित….